आन्ध्र दिवस समारोह में एक नवम्बर २०१० को माँ टीवी फेम कलाकार चंद्रशेखर रेड्डी उर्फ़ चांदनी ने ...सिलसिला यह चाहत का...मार डाला हाय मार डाला...गाने पर मनभावन डांस पेश कर लोगों को मोहित कर दिया। पाकिस्तान तक धूम मचा चुकी चांदनी असल में है मेल आर्टिस्ट -पर फीमेल स्वरुप में अपनी मनमोहक अदाओं से उसने महफ़िल को न सिर्फ जवान कर दिया बल्कि हर दिल क़ी धड़कन को तेज कर दिया था । चंद्रशेखर रेड्डी ने बातचीत में बताया कि उसे फीमेल डांसर के रूप परफोर्मेंस करने से जो आत्मसंतुष्टि मिलती है वोह बयाँ नहीं कर सकता।
Sunday, November 7, 2010
मार डाला हाय मार डाला
जमशेदपुर में
आन्ध्र दिवस समारोह में एक नवम्बर २०१० को माँ टीवी फेम कलाकार चंद्रशेखर रेड्डी उर्फ़ चांदनी ने ...सिलसिला यह चाहत का...मार डाला हाय मार डाला...गाने पर मनभावन डांस पेश कर लोगों को मोहित कर दिया। पाकिस्तान तक धूम मचा चुकी चांदनी असल में है मेल आर्टिस्ट -पर फीमेल स्वरुप में अपनी मनमोहक अदाओं से उसने महफ़िल को न सिर्फ जवान कर दिया बल्कि हर दिल क़ी धड़कन को तेज कर दिया था । चंद्रशेखर रेड्डी ने बातचीत में बताया कि उसे फीमेल डांसर के रूप परफोर्मेंस करने से जो आत्मसंतुष्टि मिलती है वोह बयाँ नहीं कर सकता।
आन्ध्र दिवस समारोह में एक नवम्बर २०१० को माँ टीवी फेम कलाकार चंद्रशेखर रेड्डी उर्फ़ चांदनी ने ...सिलसिला यह चाहत का...मार डाला हाय मार डाला...गाने पर मनभावन डांस पेश कर लोगों को मोहित कर दिया। पाकिस्तान तक धूम मचा चुकी चांदनी असल में है मेल आर्टिस्ट -पर फीमेल स्वरुप में अपनी मनमोहक अदाओं से उसने महफ़िल को न सिर्फ जवान कर दिया बल्कि हर दिल क़ी धड़कन को तेज कर दिया था । चंद्रशेखर रेड्डी ने बातचीत में बताया कि उसे फीमेल डांसर के रूप परफोर्मेंस करने से जो आत्मसंतुष्टि मिलती है वोह बयाँ नहीं कर सकता।
Saturday, November 6, 2010
मौके को कैच करने का हुनर जरुरी - रागिनी
तेलगु फिल्म और टीवी तारिका रागिनी ने आन्ध्र दिवस समारोह में एक नवम्बर को यहाँ कहा है कि फिल्मों से ज्यादा टीवी सीरियल लोगों का मनोरंजन करती हैं। महिलाओं और बच्चों के सशक्तिकरण में टीवी सीरियल और शो मील का पत्थर साबित हो रही है।
कॉमेडी शो और सीरियल लोगों को जीने कि राह दिखा रही है। १५० तेलगु फिल्मों और ४५० टीवी सीरियल में काम कर चुकी रागिनी ने बातचीत में बताया कि तलेंट के आगे भाषा, जाति और प्रदेश कभी रुकावट नहीं बनती। तलेंट के लिए हर छेत्र में काफी संभावनाएं हैं, बार मौके को कैच करने का हुनर चाहिए।
हैदराबाद से जमशेदपुर आंध्र दिवस समारोह में हिस्सा लेने आयीं रागिनी ने युवा पीढ़ी से अपनी संस्कृति कि रक्षा के लिए सजग रहने का आह्वान किया है। उन्हें जमशेदपुर का जुबिली पार्क कभी पसंद आया। वों दुबारा टाटा आना चाहती हैं।
Sunday, October 3, 2010
इमानी अकीदे की हिफाजत फर्ज - मुफ्ती

इमानी अकीदे की हिफाजत करना मुसलमानों पर फर्ज है। अल्लाह ताला और उसके रसूल सल की शान में गुस्ताखी करने वाले मुसलमान नहीं हो सकते। यह बातें तंजीम अहले सुन्नत व जमात के जनरल सेक्रेटरी मुफ्ती जियाउल मुस्तफा ने पैगामे इस्लाम जलसे में ०२ अक्टूबर २०१० को कही। हुस्सैनी मोहल्लाह जमशेदपुर में उन्हों ने कहा कि इस्लाम मोहब्बत और अमन का पैगाम देता है। हुस्सैनी मस्जिद के इमाम मौलाना सैफुद्दीन अस्दक ने कहा कि अक्ल का सही इस्तेमाल होना चाहिए। सही इस्तेमाल से इंसान कामरान बन जाता है और गलत इस्तेमाल से दुनिया को तबाह व् बर्बाद कर देता है.
Saturday, June 19, 2010
असलम बद्र को बीजेड मायल अवार्ड
Friday, April 23, 2010
इस्लामी क्वीज़ में बच्चों का जलवा
Sunday, April 4, 2010
जौहर बलियावी नहीं रहे
उर्दू के जानेमाने शायर जौहर बलियावी का 4 अप्रैल 2010 की सुबह में जमशेदपुर में इन्तेकाल हो गया.उन्हें जाकिरनगर कब्रिस्तान में इतवार को दफनाया गया.जौहर बलियावी करीब एक साल से बिस्तर पर बीमार पड़े थे.७४ साल उम्र के जौहर बलियावी के जनाज़े में कई शायर, अदीब, दानिश्वर और शिक्षाविद मौजूद थे.इनका असली नाम अब्दुल मुगनी था, वे कबिरिया मेमोरियल उर्दू स्कूल से हेड मास्टर के रूप में सुबुकदोष हुए थे.वे अपने पीछे तीन बेटे और उतने ही बहुवें छोड़ गए हैं.उनकी गजलों में ज़िन्दगी मुतहर्रिक नज़र आती है.उनकी घायल आवाज़ अलग से पहचानी जाती थी.मंज़र शहाब कहते हैं कि शायरी जौहर के मिज़ाज का हिस्सा था, वे तमाम उम्र बेरहम हालात का शिकार रहे.उन्हें एहसास था कि ज़माने का खंज़र जो हमेशा उनकी रागे जान को लहूलुहान करता रहा, वोह समाजी नेजाम से मिली थी.कुछ ही बनते हैं निशाने रहे मंजिल जौहर,
यूँ तो राहों में पड़े रहते हैं पत्थर कितने।
नूर कहिये ज़ुल्मत को, संग को गुहर कहिये,
वक़्त का तकाजा है, एब को हुनर कहिये।
दर्द के एक ही झोंके ने उठाया तूफ़ान,
किस को मालूम कि यादों का समुन्दर क्या है।
Friday, March 26, 2010
मंज़र शहाब का दर्द
उर्दू के जाने माने दानिश्वर मंज़र शहाब का दर्द उभर आया, जब वह अपनी बहु की किताब 'तयीन व तदरीस ' की तकरीब-ए - रूनुमाई में बोलने लगे.साँसें फूलने भी लगे तो पानी पीकर अपनी बात पूरी की.दर असल वह अपने दिल के जज़्बात को रोक नहीं पा रहे थे.ज़िन्दगी का ज्यादा लम्हा दरस व तदरीस में जो गुज़रा.अपनी तहरीर से खामोश गुफ्तुगू में माहिर मंज़र शहाब अच्छे मुक़र्रीर भी ठहरे हैं.जब बोलने लगते हैं तो फिर रुकने का नाम नहीं लेते, ऐसा ही कुछ हुआ 21 मार्च 2010 की शाम को.लम्बे अरसे के बाद बोले मंज़र शहाब ने तालीमी पस्मान्दिगी से लेकर अदीबों,मोअल्लिमों और उर्दू की रोज़ी रोटी खाने वालों की खूब खबर ली.उर्दू के तईं बेरुखी और पेशेवर रुख के चक्कर में गलत तलफ्फुज के इस्तेमाल पर भी गहरी नाराजगी जताई.कहा किकई ऐसे मोअल्लिम गुज़रे हैं जो 'किताब्चा' को 'कुत्ता बच्चा' पढ़ा कर गुज़र गए.
Wednesday, March 24, 2010
तहरीर खामोश गुफ्तुगू ही तो है
यह सच है कि तहरीर खामोश गुफ्तुगू है.यह सिलसिला कभी रुकना नहीं चाहिए.इसी बहाने ज़िन्दगी को नयी राह दिखाई जा सकती है.यह कोई नई और नायाब बात नहीं है.यह बरसों से होता आ रहा है.तालीम के ज़रिये उस्ताद मोहतरम यह काम सदियों पहले से करते आ रहे हैं.मुसन्निफ़ अपनी तहरीरों से लोगों की सोच में बदलाव और उनके ज़िन्दगी के स्टाइल में नयी तवानाई भी भरते रहे हैं.ज़रूरत इसे तहरीक बनाने की है.सिर्फ खानापूर्ति के लिए यह मिशन नहीं होना चाहिए बल्कि छोटी छोटी बातों से हम दूसरे की रहनुमाई कर सच्ची ख़ुशी दे सकते हैं.यह भी सच है कि मुसन्निफ़ कि लिखी तहरीरें इबारत होती हैं आयत नहीं.इबारतों में ही कई नुस्खे और तरीके नज़र आ जाते हैं,अगर हमारे अन्दर देखने वाली नज़र हो तो.कई बार ऐसा होता है कि जो हम देखते हैं वह असल में होता नहीं है.जो होता है वह नज़र नहीं आता है.दूर अनदेशी हमारी सतह पर है रह रह जाती है, गहराई को छू नहीं पाती है.हमें तहरीरी सलाहियत में इजाफा करने के लिए दूसरों कि तहरीरों को भी अपनाने से परहेज़ नहीं होनी चाहिए.दूसरों कि अच्छी बातों से भी कई नई बातें निकल आती हैं.
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