उर्दू के जानेमाने शायर जौहर बलियावी का 4 अप्रैल 2010 की सुबह में जमशेदपुर में इन्तेकाल हो गया.उन्हें जाकिरनगर कब्रिस्तान में इतवार को दफनाया गया.जौहर बलियावी करीब एक साल से बिस्तर पर बीमार पड़े थे.७४ साल उम्र के जौहर बलियावी के जनाज़े में कई शायर, अदीब, दानिश्वर और शिक्षाविद मौजूद थे.इनका असली नाम अब्दुल मुगनी था, वे कबिरिया मेमोरियल उर्दू स्कूल से हेड मास्टर के रूप में सुबुकदोष हुए थे.वे अपने पीछे तीन बेटे और उतने ही बहुवें छोड़ गए हैं.उनकी गजलों में ज़िन्दगी मुतहर्रिक नज़र आती है.उनकी घायल आवाज़ अलग से पहचानी जाती थी.मंज़र शहाब कहते हैं कि शायरी जौहर के मिज़ाज का हिस्सा था, वे तमाम उम्र बेरहम हालात का शिकार रहे.उन्हें एहसास था कि ज़माने का खंज़र जो हमेशा उनकी रागे जान को लहूलुहान करता रहा, वोह समाजी नेजाम से मिली थी.कुछ ही बनते हैं निशाने रहे मंजिल जौहर,
यूँ तो राहों में पड़े रहते हैं पत्थर कितने।
नूर कहिये ज़ुल्मत को, संग को गुहर कहिये,
वक़्त का तकाजा है, एब को हुनर कहिये।
दर्द के एक ही झोंके ने उठाया तूफ़ान,
किस को मालूम कि यादों का समुन्दर क्या है।

No comments:
Post a Comment