Friday, March 26, 2010
मंज़र शहाब का दर्द
उर्दू के जाने माने दानिश्वर मंज़र शहाब का दर्द उभर आया, जब वह अपनी बहु की किताब 'तयीन व तदरीस ' की तकरीब-ए - रूनुमाई में बोलने लगे.साँसें फूलने भी लगे तो पानी पीकर अपनी बात पूरी की.दर असल वह अपने दिल के जज़्बात को रोक नहीं पा रहे थे.ज़िन्दगी का ज्यादा लम्हा दरस व तदरीस में जो गुज़रा.अपनी तहरीर से खामोश गुफ्तुगू में माहिर मंज़र शहाब अच्छे मुक़र्रीर भी ठहरे हैं.जब बोलने लगते हैं तो फिर रुकने का नाम नहीं लेते, ऐसा ही कुछ हुआ 21 मार्च 2010 की शाम को.लम्बे अरसे के बाद बोले मंज़र शहाब ने तालीमी पस्मान्दिगी से लेकर अदीबों,मोअल्लिमों और उर्दू की रोज़ी रोटी खाने वालों की खूब खबर ली.उर्दू के तईं बेरुखी और पेशेवर रुख के चक्कर में गलत तलफ्फुज के इस्तेमाल पर भी गहरी नाराजगी जताई.कहा किकई ऐसे मोअल्लिम गुज़रे हैं जो 'किताब्चा' को 'कुत्ता बच्चा' पढ़ा कर गुज़र गए.
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