Wednesday, March 24, 2010
तहरीर खामोश गुफ्तुगू ही तो है
यह सच है कि तहरीर खामोश गुफ्तुगू है.यह सिलसिला कभी रुकना नहीं चाहिए.इसी बहाने ज़िन्दगी को नयी राह दिखाई जा सकती है.यह कोई नई और नायाब बात नहीं है.यह बरसों से होता आ रहा है.तालीम के ज़रिये उस्ताद मोहतरम यह काम सदियों पहले से करते आ रहे हैं.मुसन्निफ़ अपनी तहरीरों से लोगों की सोच में बदलाव और उनके ज़िन्दगी के स्टाइल में नयी तवानाई भी भरते रहे हैं.ज़रूरत इसे तहरीक बनाने की है.सिर्फ खानापूर्ति के लिए यह मिशन नहीं होना चाहिए बल्कि छोटी छोटी बातों से हम दूसरे की रहनुमाई कर सच्ची ख़ुशी दे सकते हैं.यह भी सच है कि मुसन्निफ़ कि लिखी तहरीरें इबारत होती हैं आयत नहीं.इबारतों में ही कई नुस्खे और तरीके नज़र आ जाते हैं,अगर हमारे अन्दर देखने वाली नज़र हो तो.कई बार ऐसा होता है कि जो हम देखते हैं वह असल में होता नहीं है.जो होता है वह नज़र नहीं आता है.दूर अनदेशी हमारी सतह पर है रह रह जाती है, गहराई को छू नहीं पाती है.हमें तहरीरी सलाहियत में इजाफा करने के लिए दूसरों कि तहरीरों को भी अपनाने से परहेज़ नहीं होनी चाहिए.दूसरों कि अच्छी बातों से भी कई नई बातें निकल आती हैं.
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