Friday, March 26, 2010

मंज़र शहाब का दर्द

उर्दू के जाने माने दानिश्वर मंज़र शहाब का दर्द उभर आया, जब वह अपनी बहु की किताब 'तयीन व तदरीस ' की तकरीब-ए - रूनुमाई में बोलने लगे.साँसें फूलने भी लगे तो पानी पीकर अपनी बात पूरी की.दर असल वह अपने दिल के जज़्बात को रोक नहीं पा रहे थे.ज़िन्दगी का ज्यादा लम्हा दरस व तदरीस में जो गुज़रा.अपनी तहरीर से खामोश गुफ्तुगू में माहिर मंज़र शहाब अच्छे मुक़र्रीर भी ठहरे हैं.जब बोलने लगते हैं तो फिर रुकने का नाम नहीं लेते, ऐसा ही कुछ हुआ 21 मार्च 2010 की शाम को.लम्बे अरसे के बाद बोले मंज़र शहाब ने तालीमी पस्मान्दिगी से लेकर अदीबों,मोअल्लिमों और उर्दू की रोज़ी रोटी खाने वालों की खूब खबर ली.उर्दू के तईं बेरुखी और पेशेवर रुख के चक्कर में गलत तलफ्फुज के इस्तेमाल पर भी गहरी नाराजगी जताई.कहा किकई ऐसे मोअल्लिम गुज़रे हैं जो 'किताब्चा' को 'कुत्ता बच्चा' पढ़ा कर गुज़र गए.

Wednesday, March 24, 2010

तहरीर खामोश गुफ्तुगू ही तो है

यह सच है कि तहरीर खामोश गुफ्तुगू है.यह सिलसिला कभी रुकना नहीं चाहिए.इसी बहाने ज़िन्दगी को नयी राह दिखाई जा सकती है.यह कोई नई और नायाब बात नहीं है.यह बरसों से होता आ रहा है.तालीम के ज़रिये उस्ताद मोहतरम यह काम सदियों पहले से करते आ रहे हैं.मुसन्निफ़ अपनी तहरीरों से लोगों की सोच में बदलाव और उनके ज़िन्दगी के स्टाइल में नयी तवानाई भी भरते रहे हैं.ज़रूरत इसे तहरीक बनाने की है.सिर्फ खानापूर्ति के लिए यह मिशन नहीं होना चाहिए बल्कि छोटी छोटी बातों से हम दूसरे की रहनुमाई कर सच्ची ख़ुशी दे सकते हैं.यह भी सच है कि मुसन्निफ़ कि लिखी तहरीरें इबारत होती हैं आयत नहीं.इबारतों में ही कई नुस्खे और तरीके नज़र आ जाते हैं,अगर हमारे अन्दर देखने वाली नज़र हो तो.कई बार ऐसा होता है कि जो हम देखते हैं वह असल में होता नहीं है.जो होता है वह नज़र नहीं आता है.दूर अनदेशी हमारी सतह पर है रह रह जाती है, गहराई को छू नहीं पाती है.हमें तहरीरी सलाहियत में इजाफा करने के लिए दूसरों कि तहरीरों को भी अपनाने से परहेज़ नहीं होनी चाहिए.दूसरों कि अच्छी बातों से भी कई नई बातें निकल आती हैं.