Friday, April 23, 2010

इस्लामी क्वीज़ में बच्चों का जलवा

अंजुमन तरक्की उर्दू जमशेदपुर की मेजबानी में २३ अप्रैल २०१० को माइकल जान हॉल में मेगा इस्लामी क्वीज़ का एहतमाम हुआ.बच्चों में इस्लाम और कुरान के तेयीं बेदारी और गैर मामूली इल्म देखते बन रही थी. कई मौकों पर क्वीज़ मास्टर इमाम गजाली भी हैरान रह गए.४० टीमों के तहरीरी दौर से गुजरने के बाद ६ टीमों को फ़ाइनल रौंद के लिए चुना गया.इन टीमों का नाम इस्लाम की बुनियाद इस्लाम, तौहीद, नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज हज रखा गया था.मरकजी दारुल करात आजादनगर के ग़ुलाम अहमद और मोहम्मद अबू तालिब खान हज मुश्तमिल ज़कात टीम ने खिताबी जीत हासिल की.इस्लाम टीम (नगमा नाज़ और नेहा तबस्सुम, कबीर मेमोरियल स्कूल) को दुसरे मुकाम पर इत्मीनान होना पड़ा.फातेह तालिब इल्मों को टाटा स्टील कारपोरेट कम्युनि केशन के चीफ संजय चौधरी ने इनाम से नवाज़ा.मौके पर सययेद रज़ा अब्बास रिजवी छब्बन समेत कई जाने माने हस्ती मौजूद थे.

Sunday, April 4, 2010

जौहर बलियावी नहीं रहे

उर्दू के जानेमाने शायर जौहर बलियावी का 4 अप्रैल 2010 की सुबह में जमशेदपुर में इन्तेकाल हो गया.उन्हें जाकिरनगर कब्रिस्तान में इतवार को दफनाया गया.जौहर बलियावी करीब एक साल से बिस्तर पर बीमार पड़े थे.७४ साल उम्र के जौहर बलियावी के जनाज़े में कई शायर, अदीब, दानिश्वर और शिक्षाविद मौजूद थे.इनका असली नाम अब्दुल मुगनी था, वे कबिरिया मेमोरियल उर्दू स्कूल से हेड मास्टर के रूप में सुबुकदोष हुए थे.वे अपने पीछे तीन बेटे और उतने ही बहुवें छोड़ गए हैं.उनकी गजलों में ज़िन्दगी मुतहर्रिक नज़र आती है.उनकी घायल आवाज़ अलग से पहचानी जाती थी.मंज़र शहाब कहते हैं कि शायरी जौहर के मिज़ाज का हिस्सा था, वे तमाम उम्र बेरहम हालात का शिकार रहे.उन्हें एहसास था कि ज़माने का खंज़र जो हमेशा उनकी रागे जान को लहूलुहान करता रहा, वोह समाजी नेजाम से मिली थी.
कुछ ही बनते हैं निशाने रहे मंजिल जौहर,
यूँ तो राहों में पड़े रहते हैं पत्थर कितने।

नूर कहिये ज़ुल्मत को, संग को गुहर कहिये,
वक़्त का तकाजा है, एब को हुनर कहिये।
दर्द के एक ही झोंके ने उठाया तूफ़ान,
किस को मालूम कि यादों का समुन्दर क्या है।